उत्तरकाशी। जब राजनीतिक मंच केवल भाषणों तक सीमित न रहकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनें, तब लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं। उत्तरकाशी जनपद में भाजपा जिला महिला मोर्चा की अध्यक्ष ललिता सेमवाल द्वारा शुरू की गई पहल इसी सोच का जीवंत उदाहरण है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की बातें वर्षों से की जाती रही हैं, किंतु जब इन बातों को व्यवहार में उतारा जाता है, तभी उनका वास्तविक अर्थ सामने आता है। अपने सम्मेलनों एवं बैठकों में लोकल से वोकल को प्राथमिकता देते हुए स्वयं सहायता समूहों की बहनों द्वारा निर्मित अरसा, रोटाना और स्थानीय उत्पादों की गिफ्ट टोकरी को अपनाने का निर्णय एक छोटा दिखने वाला, किंतु दूरगामी प्रभाव वाला कदम है।
यह पहल न केवल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक संबल देती है, बल्कि उनके श्रम, हुनर और आत्मसम्मान को भी पहचान दिलाती है। उत्तरकाशी जैसे पर्वतीय जनपद में जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को मंच देना एक सामाजिक आवश्यकता बन चुका है।
प्रदेश की वरिष्ठ नेत्री श्रीमती नेहा जोशी को स्थानीय उत्पाद भेंट कर इस अभियान की शुरुआत करना यह दर्शाता है कि नेतृत्व जब स्थानीयता से जुड़ता है, तब नीति और जमीन के बीच की दूरी समाप्त होती है। गायत्री महिला स्वयं सहायता समूह, जोशियाड़ा की बहनों का उत्साह इस बात का प्रमाण है कि सही दिशा में दिया गया छोटा प्रोत्साहन भी बड़े बदलाव की नींव रख सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में अजय बड़ोला जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका भी उल्लेखनीय है, जो वर्षों से स्वयं सहायता समूहों को बाजार से जोड़ने और युवाओं को रोजगार की दिशा दिखाने का कार्य कर रहे हैं। ऐसे प्रयास यह सिद्ध करते हैं कि सामाजिक परिवर्तन किसी एक संस्था या व्यक्ति से नहीं, बल्कि सामूहिक सोच और सहयोग से संभव होता है।
ललिता सेमवाल की यह पहल उनके संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों का प्रतिबिंब है। उनके ससुर, उत्तरकाशी बार काउंसिल के वरिष्ठ वकील स्वर्गीय श्री चिरंजीप्रसाद सेमवाल जिस निष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे, वही प्रतिबद्धता आज उनके कार्यों में दिखाई देती है। नेतृत्व वही सार्थक होता है जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक असर पहुंचाए।
आज आवश्यकता है कि लोकल से वोकल को औपचारिक नारों से निकालकर दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए। यदि हर संस्था, हर संगठन और हर राजनीतिक मंच स्थानीय उत्पादों और स्थानीय श्रम को प्राथमिकता दे, तो आत्मनिर्भर भारत का सपना केवल नीति नहीं, वास्तविकता बन सकता है। उत्तरकाशी से उठी यह पहल अन्य जनपदों के लिए भी प्रेरणा बने—यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
