देहरादून। पुरानी कहावत है- उम्मीद पर दुनिया कायम है, उम्मीद वह शब्द है जो अनंत संभावनाओं से भरा एक सकारात्मक भाव है, मगर इन उम्मीदों को साकार करने के लिए ईमानदारी, कठोर इच्छाशक्ति, वास्तविकता की समझ, व्यावहारिक रणनीति और क्रियाशीलता आवश्यक हैं।

कुछ वर्ष अकल्पनीय उपलब्धियों और अप्रत्याशित संकटों के साल रहे हैं। एआई यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान व चिकित्सा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां और विश्व की आर्थिक समृद्धि, शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति जैसी उपलब्धियां एक तरफ हैं, तो कोरोना संकट और युद्धों में बढ़ोतरी (जिनमें हजारों बेकसूर बच्चों, महिलाओं व नागरिकों की हत्याएं हुई) पर्यावरण संकट, धार्मिक व राजनीतिक अतिवाद तथा आर्थिक गैर-बराबरी में वृद्धि जैसी गंभीर चुनौतियां दूसरी ओर हैं।

आज दुनिया में जितने संसाधन मौजूद हैं; गंभीर से गंभीर समस्याओं की जितनी जानकारी और उनके समाधानों की समझ है; जितनी उन्नत टेक्नोलॉजी और सूचनाओं का भंडार है, वैश्विक विकासका स्पष्ट एजेंडा है और मनुष्य की स्वतंत्रता व न्याय के लिए जितने कानून-कायदे बने हुए हैं, वे सब मिलकर साल 2026 को पहले से बेहतर बनाने को नाकाफी हैं।

आज हरेक स्तर पर नैतिक जिम्मेदारी की जबर्दस्त कमी है, इसीलिए एक-दूसरे की समस्याओं को जानने, उन्हें खुद की समस्या की तरह महसूस करने और शिद्दत के साथ उनका समाधान तलाशने के प्रयासों की जरूरत है। समस्याओं का रोना रोने के बजाय हमें समाधान की संस्कृति विकसित करनी होगी। यही है, इसीलिए अनेक विश्व नेताओं और नोबेल विजेताओं के साथ मैंने करुणा के वैश्वीकरण का आंदोलन शुरू किया है। साल-डेढ़ साल के भीतर ही इस आंदोलन को दुनिया भर में जितना समर्थन मिला है, उसने 2026 की मेरी उम्मीदों को कई गुना बढ़ा दिया है।

युवा पीढ़ी मेरी उम्मीद की सबसे बड़ी किरण है। गरीब से गरीब परिवार के बच्चे भी आज अच्छी पढ़ाई के लिए लालायित हैं। वे अपने लिए बड़े-बड़े सपने देखने लगे हैं। पहले के मुकाबले बाहरी बाहरी दुनिया के बारे में उनकी पानि कारी के साथ-साथ आत्मविश्वास बढ़ा है। किशोरों और युवाओं का एक बड़ा समूह समाज और राजनीति की गहरी समझ रखता है। यह पीढ़ी विश्व की साझा समस्याओं का रोना रोने के बजाय हमें समाधान की संस्कृति विकसित करनी है । यही करुणा है। इसमें युवा पीढ़ी से बहुत उम्मीद है।

तमाम सरकारों और समाज की जिम्मेदारी है कि वे इस शक्ति को सार्थक, सकारात्मक और समाजोपयोगी बनाने के ठोस प्रयास करें। बच्चों और युवाओं की शिक्षा, नवाचार और शोध के क्षेत्रों में गुणवत्ता व गतिशीलता के लिए सरकारों तथा विश्व समुदाय को पर्याप्त निवेश करना चाहिए।

मत-मजहब और विचारधारा के नाम पर फैलाए जा रहे झूठ, धर्मांधता, उन्माद, हिंसा, घृणा, अवैज्ञानिकता व अश्लीलता जैसे भटकाव सेयुवाओं को बचाना जरूरी है। सकारात्मक और रचनात्मक सोच रखने वाले नौजवानों को प्रोत्साहित करते हुए अलग-अलग क्षेत्र में नेतृत्व देने की जरूरत है। हमारे सामने आर्थिक विषमता व बेरोजगारी की गंभीर चुनौतियां हैं। उम्मीद है कि सरकारें, उद्योग जगत और समाज परस्पर भरोसे, सम्मान और भागीदारी के साथ इनका निराकरण करेंगे।

भारत को ही लीजिए। 2026 में एक साल के लिए यह ब्रिक्स का अध्यक्ष रहेगा। यह बहुत अच्छा मौका है। यह समूह दुनिया को एक-ध्रुवीय या दो-ध्रुवीय बनने से रोकने में सक्षम हो सकता है। डॉलर के मुकाबले ब्रिक्स की नई मुद्रा दुनिया के आर्थिक परिदृश्य व पश्चिमी देशों के दबदबे वाली राजनीति को बदल सकती है। उम्मीद कर सकते हैं कि भारत हमेशा से चली आ रही गुट-निरपेक्षता को साहसपूर्ण ढंग से निभाता हुआ, नेतृत्वकारी भूमिका अदा कर सकता है।

‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य पूरा करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य होना चाहिए। उम्मीद है, राजनेता व कार्यकर्ता अपनी विचारधाराओं एवं चुनावी गुणा-गणित से ऊपर उठकर, मत-पंथों के नेता व गुरु अपने-अपने दायरे से निकलकर और समाज के हर वर्ग के लोग विकास की कतार में पीछे छोड़ दिए गए बच्चों, बहनों और भाइयों को साथ लाकर यह महान सपना पूरा करेंगे।

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