नई टिहरी (सुरेन्द्र प्रसाद भट्ट)। प्योंली संरक्षण : प्रकृति और संस्कृति का संगम: सुशील बहुगुणा।
उत्तराखंड की धरती केवल पर्वतों, नदियों और देवालयों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहाँ की वनस्पतियाँ भी हमारी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक है प्योंली — पीले रंग का वह सुंदर पुष्प जो पहाड़ों में वसंत ऋतु के आगमन का संदेशवाहक माना जाता है। जब पहाड़ों पर सूरज की पहली किरण पड़ती है और प्योंली के फूल खिलते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने स्वयं पीतांबर धारण कर लिया हो।
प्योंली केवल एक फूल नहीं, बल्कि लोकजीवन की संवेदना है। लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक उत्सवों में इसका विशेष स्थान है। ग्रामीण अंचलों में इसे शुभता, समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। बच्चों के गीतों से लेकर युवाओं की स्मृतियों तक, प्योंली पहाड़ की आत्मा में बसी हुई है।
किन्तु बदलते समय के साथ यह प्रतीकात्मक पुष्प संकट का सामना कर रहा है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, सड़क निर्माण, अनियोजित विकास और बढ़ती आग की घटनाओं ने इसके प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है। कई स्थानों पर जहाँ पहले प्योंली के फूलों की बहार दिखाई देती थी, अब वहाँ सूनी ढलानें नजर आती हैं।
प्योंली का संरक्षण केवल एक पौधे को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पर्यावरण दोनों को सुरक्षित रखने का संकल्प है। इसके लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, जंगलों में लगने वाली आग पर नियंत्रण, पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देना तथा प्योंली की नर्सरी विकसित करना जैसे कदम प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। विद्यालयों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से इसके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुँचाना भी जरूरी है।
यदि हम आज सजग नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल पुस्तकों में ही प्योंली का नाम पढ़ेंगी। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम प्योंली की रक्षा करते हैं, तो वास्तव में हम अपनी जड़ों, अपनी परंपराओं और अपने अस्तित्व की रक्षा करते हैं।
आइए संकल्प लें कि प्योंली की मुस्कान यूँ ही पहाड़ों पर खिलती रहे, और वसंत का यह संदेशवाहक आने वाले वर्षों तक हमारी संस्कृति को सुवासित करता रहे।
